Vikram Aur Betaal | चार राजकुमार

बहुत पुरानी बात है, मिथिला में उदय दित्य नामक एक बुद्धिमान राजा थे वे अपनी प्रजा को बहुत प्रिय है उनकी प्रजा उन्हें उनकी दयालुता, समानता तथा न्याय प्रियता के लिए बहुत पसंद करती थी।

राजा की रूपमंजरी नामक एक पुत्री थी, जो बहुत ही बुद्धिमान तथा सुंदर थी। रूप मंत्री को जो भी देखता था, बस देखता ही रह जाता था। जब वह विवाह के योग्य हुई तो उसके लिए ढेरों रिश्ते आने लगे। राजा और रानी के लिए योग्य वर का चुनाव करने की समस्या खड़ी हो गई।

एक दिन उदय अपने सजे हुए दरबार में बैठे थे, तभी एक सुंदर राजकुमार वहां आया। सादर अभिवादन कर रहे बोला, “ मैं कलिंग का राजकुमार हूं और राजकुमारी से विवाह की इच्छा लेकर आया हूं”।

राजा ने कहा, “ मैं तुम्हारी इच्छा का सम्मान करता हूं।

कलिंग हमारा पड़ोसी मित्र राज्य है। तुम से राजकुमारी का विवाह करने से हमारे संबंध और भी गहरे बन जाएंगे। तुम राजवंश के भी हो परंतु तुममे ऐसी कौन सी कौन सी विशेषता है, जो तुम्हें दूसरों से अलग करती है?

राजकुमार बोला, “ महाराज! मैं एक योद्धा हूं और बहुत अच्छे गुरुओं के द्वारा युद्ध विद्या में पारंगत हूं। मैं अपने देश ही सेना का सेनापति हूं और कई युद्ध में जीत चुका हूं”।

राजकुमार की बात सुनकर राजा ने प्रसन्न होकर राजकुमार को अपने महल में राजकीय अतिथि के रूप में राजकुमारी का निर्णय आने तक रुकने के लिए कहा।
अगले दिन राजसभा में दूसरा राजकुमार उपस्थित हुआ और राजकुमारी के साथ विवाह करने की इच्छा से बोला, “ महाराज, मैं जनकपुर का राजकुमार हूँ। मैंने बहुत सारी धार्मिक पुस्तकें पढ़ी हैं और काफी समय से जीवन का सत्य ढूंढ रहा हूं। ज्ञान की अपूर्व चाहा कि मुझे सबसे अनुपम बनाती है”।
राजा राजकुमार से बहुत प्रभावित हुआ और उसे अपने महल के अतिथि गृह में कुछ दिन ठहरने के लिए कहा।

तीसरे दिन वैशाली का राजकुमार दरबार में उपस्थित हुआ और रूपमंजरी से विवाह की इच्छा से बोला, “ महाराज, मुझे प्रकृति मां का आशीर्वाद प्राप्त है। मैं पशु पक्षियों की भाषा को समझ सकता हूं”। राजा ने उसके गुणों की प्रशंसा करते हुए उसे भी महल के अतिथि गृह में राजकुमारी के निर्णय तक रुकने के लिए कहा।

चौथे दिन मालव्य राजकुमार आया। उसने भी राजकुमारी से विवाह की इच्छा बताते हुए कहा, “ महाराज, मैं बहुत ही धनी राज्य का राजकुमार हूं। मेरा मानना है कि धन से ही प्रगति होती है। मैं एक व्यापारी हूं और धन से धन कमा सकता हूं”।

चारों राजकुमारों का विवरण सुंदर राजा और रानी निर्णय की स्थिति में आ गए। उन्हें कुछ समझ नहीं आ रहा था कि वे किसे अपनी पुत्री के योग्य पर चुने। उन्होंने अंत में निर्णय राजकुमारी पर ही छोड़ दिया।

इतना कहकर बेताल रुक गया और राजा से पूछा, “ राजन्! आप ही बताइए राजकुमारी को कितना चाहिए? उसकी बुद्धिमानी और सुंदरता के हिसाब से कौन सबसे अधिक योग्य वर है?”

विक्रमादित्य नें तुरंत उत्तर दिया, “ यदि राजकुमारी सच में बुद्धिमान हैं तो वह कलिंग के राजकुमार को चुनेगी। जनकपुर का राजकुमार विद्वान तो है, पर अच्छा शसाक तक नहीं बन सकता है।वैशाली के राजकुमार पर प्रकृति मां की कृपा है, वह पशु पक्षी की भाषा समझ सकता है, पर युद्ध की स्थिति में उसका यह गुण किस काम का? मालव्य का राजकुमार एक अच्छा व्यापारी तो है, पर राजा बनने के लायक नहीं है। यदि राजकुमारी समझदार है तो वह अपने लोगों के भले को देखते हुए कलिंग के राजकुमार को ही चुनेगी”।

“तुम सही हो राजन्!” ऐसा हुआ देपालपुर कर वापस पीपल के पेड़ पर चढ़ गया।

बेताल पेड़ की शाखा से प्रसन्नतापूर्वक लटका हुआ था, तभी विक्रमादित्य ने वहां पहुंचकर उसे पेड़ से उतारा और अपने कंधे पर डाल कर चल दिए।

आकाश नितेश थोड़े-थोड़े बादल छटने लगे और बादलों से तारे दिखने लगे थे। बेताल ने गहरी सांस लेकर राजा से कहा, “ तुम हार नहीं मानते हो… है ना…?” राजा मुस्कुराया और बेताल ने अपनी कहानी शुरू की।

पाटलिपुत्र में कभी एक बहुत ही विद्वान ब्राह्मण रहता था। वह बहुत ही विनम्र और धार्मिक था। उसके 2 पुत्र थे। दोनों ही अपने पिता की तरह विनम्र थे। उनमें जन्मजात अद्भुत गुण थे।

बड़े पुत्र में लोगों का चरित्र पहचानने की शक्ति थी। ऐसा करके लोगों को दूसरों के इरादे पहले से ही बता कर सावधान कर देता था। छोटा पुत्र सूंघकर ही पहचान लिया करता था।

धीरे-धीरे ब्राह्मण के दोनों पुत्रों की ख्याति चारों तरफ फैल गई और राजा के कानों तक भी पहुंची। राजा ने उन्हें बुलाकर अपने यहां विशेष सलाहकार के रूप में रख लिया।
दोनों भाई राजा को निर्णय लेने में मदद करने लगे। राधा जब राजनयिक वार्ताओं के लिए दूसरे राज्य में जाते थे, तो दोनों ब्राह्मण पुत्र भी आ जाया करते थे।

1 दिन राजा इसी प्रकार की यात्रा पर दूसरे राज्य गए हुए थे। वहां उनका भव्य स्वागत हुआ। राजा के सम्मान मैं उत्सव जैसा माहौल था और कई रंगारंग कार्यक्रम भी आयोजित किए गए थे।

राजा और साथ गए लोगों ने भोजवा कार्यक्रम का खूब आनंद उठाया। राजा बहुत थक गए थे। आराम करने के लिए राजकीय अतिथि गृह में गए। वह भी खूब सजा हुआ था। राजा ने दोनों भाइयों के साथ आरामग्रह में प्रवेश किया। प्रवेश करते ही बड़े भाई को दाल में कुछ काला लगा। उसने कहा, “ महाराज, मुझे इस राज्य के राजा पर विश्वास नहीं है। वह आपसे ईर्ष्या करता है और आप को मारना चाहता है।”

उसकी बात सुनकर आश्चर्यचकित होते हुए राजा ने कहा, “ क्या बकवास कर रहे हो, उसने हमारी सुख सुविधा का इतना ख्याल रखता है और तुम्हें लगता है कि वह हमें नुकसान पहुंचाने की योजना बना रहे हैं। मुझे लगता है बहुत ज्यादा खाना खाने से तुम्हारा दिमाग काम नहीं कर रहा है”।

यह कहकर राजा बिस्तर पर बैठकर तकिया उठाने के लिए थोड़ा झुके… तभी बड़े भाई ने उनकी कलाई पकड़ ली।

“ मुझे क्षमा करें महाराज, पर मुझे कुछ गड़बड़ लग रही है उस तकिए पर लेटने से पहले आप उसकी जांच जरूर करवा लें”।

राजा परेशान तथा चिड़चिड़ा हो गए। बड़े भाई की अवज्ञा ना करते हुए उन्होंने छोटे भाई से तकिए की जांच करवाई। छोटे भाई ने पास आकर सूंघा और कहां, “ महाराज, तकिए में जानवरों के बाल हैं। कुछ इतने नुकीले हैं की लेटते ही चुभेंगे या चमड़ी काट देंगे। तकिए के किनारे पर लगी लेस पर जहर है जिससे आपकी जान भी जा सकती है”।

राजा ने तकिए को हाथ भी नहीं लगाया और सारी रात बिना तकिए के ही बिताई सुबह दे चुपचाप अपने साथ उस तकिए को लेकर अपने राज्य वापस लौट आए। तकिए की जांच करवाने पर दोनों भाइयों की सत्यता प्रमाणित हो गई। राजा ने दोनों भाइयों को उनकी सेवा के लिए बहुत सारा इनाम दिया।

बेताल ने कहा, “ राजन, दोनों भाइयों में कौन अधिक चतुर तथा अधिक * था?

मुस्कुराते हुए राजा ने उत्तर दिया, “ बड़ा भाई। उसी ने मेजबान के गलत इरादे को भांपा था। उसी ने तकिए को भी पहचाना था। छोटे भाई ने तो बाद में बड़े भाई की शंका को सही बताया था”।

बेताल जोर-जोर से हंसने लगा। बेताल को यह खेल खेलने में मज़ा आने लगा था। उसने कहा, “ राजन तुम्हारा उत्तर बिल्कुल सही है” और वह उड़ा और पेड़ पर चला गया।

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