विक्रम-बैताल की कहानी: तांत्रिक की चाल

बहुत समय पहले की बात है, भारत में विक्रमादित्य नामक एक राजा थे। वे अपनी दयालुता और बुद्धिमानिता के लिए जाने जाते थे।उनकी बहादुरी की खूब चर्चा होती थी

एक दिन राजा विक्रमादित्य के दरबार में एक तांत्रिक आया। उसने राजा को उपहार स्वरूप एक फल दिया। जिसे राजा ने सप्रेम स्वीकार किया। उस अनोखे तांत्रिक ने राजा से फल को राजकोष में रखने का अनुरोध किया।

अगले दिन तांत्रिक फिर आया और राजा को एक और फल देकर राजकोष में रखने का अनुरोध किया। सालों तक यही क्रम चला। एक दिन कोषाध्यक्ष ने कर राजा को एक अजीबोगरीब घटना बताई।
राजा दौड़ता हुआ राजकोष पहुँचा। तांत्रिक के द्वारा दिए हुए सारे फल किमती रत्नों मे बदल चुके थे। किसी को भी इतने बहुमूल्य रत्नों को देखकर अपनी आँको पर विश्वास नही हो रहा था। राजा और मंत्री खुशी से फूले नही समा रहे थे।

अगले दिन तांत्रिक फिर आया। राजा ने अपने सिंहासन से उठकर आदरपूर्वक सका नमन करते हुए कहा, “महात्मा जी, आपने दरबार में पधार का हमारा तथा दरबार का मान बढ़ाया है। मुझे आशिर्वाद दें। बताइये मैं आपके ले क्या कर सकता हूं?”
तांत्रिक ने कहा, “मेरा आशिर्वाद हमेशा तुम्हारे साथ है। पर हां, तुम मेरी एक मदद कर सकते हो…”।

राजा विक्रमादित्य मदद मांगने वालों की हमेशा मदद करते थे। उसकी स्विकृति पर तांत्रिक ने कहा, “घने जंगलों मे एक पीपल का पेड़ है, उस पर एक शव लटका हुआ है। मुझे देवी को प्रसन करने के लिए उस शव की बलि देनी है। उस जंगल में जाने से लोग डरते हैं। तुम्हे अमावस की रात को उस जंगल में अकेले ही जाना होगा। क्या तुम मेरे लिए उस शव को ला पाओगे”?

राजा अमावस्या की राज को जंगल के लिए निकल पड़े। काली अंधेरी रात थी। जंगल में गहरा अंधकार था पर बिना विचलित हुए और बिना डरे, राजा आगे बढ़ते गए। जंगल के बीच में वे पीपल के पेड़ के पास पहुँचे। पेड़ के चारो ओर कंकाल, खोपड़ी और हड्डियां जमीन पर बिखरी हुई थीं। पेड़ पर उल्टा लटका हुआ एक सफेद रंग का शव राजा को दिखाई दिया।

राजा पेड़ पर चढ़ गए। उन्होंने शव को बढ़ी तेजी से उतारा और नीचे उतर आए। उसे कंधे पर डालकर राजा वापस चलने लगे। अचानक शव हंसने लगा। उसे हंसता देक राजा को एक झटका लगा, पर बिना डरे उन्होनें अपना चलना जारी रखा।

शव ने पूछा, “तुम कौन हो”?

राजा ने कहां, “मैं राजा विक्रमादित्य हूँ”।

“ आप कौन है”? राजा ने शव से पूछा

शव ने कहा, “मैं बेताल हूँ। तुम मुझे कहां ले जा रहे हो”?

राजा ने बेताल को तांत्रिक की पूरी कहानी बता दी। कहानी सुनकर बेताल बोला, “मेरा और तांत्रिक का जन्म एक ही समय मे हुआ था। अगर तांत्रिक मुझे प्राप्त कर लेगा, तो मुझे मारकर वह अपनी शक्ति बढ़ा लेगा और बाद में वह तुम्हे भी मार देगा। वह बहुत बड़ा धोखेबाज है”।

राजा सोच में पड़ गया। फिर बोला, “मैंने तांत्रिक से आपको लाने का वादा किया है। चाहे मेरी जान भी चली जाए, पर वादा निभाने के लिए मुझे आपको ले ही जाना पड़ेगा”।

बेताल राजा से प्रभावित हो गया और उसने राजा की मदद करने का निर्णय किया। वह राजा से बोला, “ठीक है, मैं तुम्हे कहानी सुनाकर अंत में प्रश्न पूछूंगा। अगर सही हुआ तो मैं वापस पेड़ पर चला जाउंगा। अगर तुम चुप रहे तो तुम्हारा सिर फट जाएगा… क्या तुम्हे मंजूर है…”?

बेताल जानता था कि राजा बुद्धिमान है और हमेशा सच बोलेंगे तथा सही उत्तर ही देंगे। विक्रमादित्य के पास राजी होने के अलावा और कोई विकल्प ही नही था। बेताल ने अपनी कहानी शुरु की।।।।।।।।

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